4.7.12
5.4.12
17.6.11
4.6.11
3.5.11
नेशनल फेडरेशन ऑफ़ जर्नलिस्ट कार्यसमिति की बैठक २८-२९ मई २०११ को दिल्ली में
30.4.11
23.7.09
हारा वही जो लड़ा नहीं है ......
हारा वही ,
जो लड़ा नहीं है ......
और ,
हम लड़ते रहे हर वो लडाई ,
जिनसे है इंसानियत शर्मसार ,
हम ख़म ठोककर खड़े रहे तब भी ,
जब शासन प्रशासन के आगे ,
मास्ट हेड भी झुका लेते थे अपना सर
हमने शीश झुकाया - उन लोंगो
और कामों के लिए ,
जिनसे संवरता है हम सब का कल ,
हम वीरानों में थे , हम थे अट्टहासों के बीच भी ,
हम चीत्कारों को सुन रहे थे
और महसूस कर रहे थे सिसकियों को भी ,
हर दुःख , हर सुख में
हर शर्म में और हर गौरव में
हम थे आपके साथ ,
हर बार हमने बताया सच ,
क्योकि हम हमेशा से थे सच के साथी ,
और हैं साहस के साझीदार
क्योकि हम चाहते हैं
सबके लिए स्वाभिमान
6.3.09
''पत्रकारिता के पापी'' - एक महिला पत्रकार के संस्मरण
एक सुंदर लड़की। एंकर बनने का सपना। थोड़े से संपर्क और ढेर सारा उत्साह। निकल पड़ी। एक प्रदेश की राजधानी पहुंची। वहां उसकी एंकर सहेली वेट कर रही थी। गले मिली। आगे बढ़ी.......... और अगले एक हफ्ते में ही वो सुंदर लड़की पत्रकारिता की काली कोठरी में कैद हो गई। वहशी संपादकों, रिपोर्टरों, कैमरामैनों के जाल में फंस गई। इन लोगों को चाहिए दारू और देह। इसी को पाने के लिए पत्रकारिता की दुकान सजा रखी थी।
उसकी सहेली पहले से उस दलदल में धंसी हुई थी। निकलने की चाहत में और गहरे धंसे जा रही थी। जब वह एक से दो हुईं तो दुखों का साझा हुआ। एक दिन दोनों ने मुक्ति पाने का इरादा किया। गालियां देते, कोसते वहां से निकल भागीं। पहुंच गईं दूसरे प्रदेश की राजधानी। उम्मीद में कि अब सब बेहतर होगा। जो कुछ वीभत्स, भयानक, घृणित था, वो बीता दिन था। वो दिन गए, वो सब भुगत लिया। भूल जाने की कोशिश करने लगीं।
याद करने लगीं अपने सपने। सपनों को सचमुच में तब्दील होते देखने के लिए निकल पड़ीं मैदान में। जो सोच के इस फील्ड में आई थीं, उसे जीने के लिए खुद को तैयार करने लगीं, उसे पाने के लिए प्रयास करने लगीं। पर इन सहेलियों की देह ने यहां भी पीछा नहीं छोड़ा। जिस मीडिया कंपनी में भर्ती हुईं वहां भी था एक चक्रव्यूह। ऐसा चक्रव्यूह जिसे भेदना किसी लड़की के वश में कभी न रहा। ये लड़कियां भी इसमें फंस गईं। पत्रकारिता में सफल बनने के नुस्खे सिखाते हुए यहां के भी संपादक, रिपोर्टर, कैमरामैन इन लड़कियों के लिए काल बन गए। ये तो पहले वालों से भी ज्यादा घृणित, भयानक और वहशी निकले...................।
''पत्रकारिता के पापी''... यह शीर्षक खुद उस महिला जर्नलिस्ट ने दिया है जिसने उजले चेहरों के कालेपन को भुगता है। सौजन्य - भड़ास फॉर मीडिया डाट काम
भड़ास फॉर मीडिया डाट काम ने ऐसे घृणित कृत्य , करने वाले वहशी मीडिया कुकर्मियों को बेनकाब करने का बीडा उठाया है छत्तीसगढ़ पत्रकार संघ यसवंत सिंह जी के इस जज्बे को सलाम करता है । छत्तीसगढ़ पत्रकार संघ हर लडाई में आपके साथ है ।
23.2.09
एक प्रेस रिपोर्टर के भगीरथ प्रयास से मासूम को मिली नई जिन्दगी
ऐसे कर्ताब्यानिस्थ व सहृदय पत्रकार को अपने बीच पाकर छत्तीसगढ़ पत्रकार संघ गौरान्वित है हम सभी पत्रकार साथी बालक अरविन्द के स्वास्थ्य की कामना के साथ मो असलम जी को साधुवाद देते है ।
20.1.09
पत्रकारिता और पत्रकार
हुकूमतें सबसे पहले उस पत्रकार को निशाना बनाती है जो इस सिलसिले की पहली कड़ी होता है- वो रिपोर्टर जो कहीं जाकर, किन्हीं अंधेरों में दाखिल होकर, सूचनाओं की सेंधमारी करता है और अगले दिन के अखबार के लिए एक जरूरी मसाला जुटाता है। लेकिन उसकी ताकत यही होती है कि वो मरते-मरते भी अपना पेशा नहीं भूलता। उसके हाथ से उसकी कलम, उसका कैमरा नहीं छूटता- सच को पकड़ने की उसकी जिद नहीं खत्म होती, भले इसके लिए जो भी कीमत चुकानी पड़े।
14.1.09
मिडिया की आजादी खतरे में ,
ध्यान रखिए, यह लड़ाई सिर्फ इलेक्ट्रानिक मीडिया की ही नहीं है। 'इमरजेंसी सिचुवेशन' और 'नेशनल क्राइसिस' जैसे धीर-गंभीर शब्दों की आड़ में आज टीवी पर जनांदोलनों को दिखाने से रोके जाने की तैयारी है तो कल इसे प्रिंट मीडिया और वेब माध्यमों पर भी लागू किया जा सकता है। सरकार ने टीवी को पहले इसलिए निशाना बनाया है क्योंकि कुछ गल्तियों के चलते टीवी वालों के प्रति जनता में भी गुस्सा है। इसी गुस्से का लाभ सरकार उठा रही है। अब जबकि टीवी के लोग खुद एक संस्था का गठन कर अपने लिए गाइडलाइन तैयार करा चुके हैं और उसे फालो करने का वादा कर चुके हैं, ऐसे में सरकार का काला कानून लाना उसकी नीयत को दर्शाता है।
नेताओं की चले तो देश में मीडिया कभी आजाद तरीके से काम न कर सके क्योंकि ये मीडिया और न्यायपालिका ही हैं जो अपनी आजादी का उपयोग करते हुए बड़े-बड़े शूरमाओं की असल पोल-पट्टी सामने लाने में सक्षम होते रहे हैं और जनता के गुस्से को सत्ताधारियों तक पहुंचाने का माध्यम बनते रहे हैं। सरकार में बैठे लोगों के मन में टीवी वालों के प्रति गुस्सा इसलिए भी है क्योंकि मुंबई आतंकी हमलों के बहाने न्यूज चैनलों ने देश की लचर सुरक्षा व्यवस्था पर तीखे अंदाज में सवाल उठाए। सरकार और उसकी एजेंसियों के नकारेपन को पूरे देश के सामने उजागर किया। इसी 'गल्ती' की सजा मीडिया को देने पर आमादा है सरकार।
कैबिनेट नोट बटने का मतलब होता है मंत्रिमंडल की अगली किसी भी बैठक में इस पर मुहर लगाकर कानून बना देना। मीडिया के लिए कानून संसद में बहस के जरिए बनाए जाने की बजाय चोर दरवाजे से कानून लाने की तैयारी है। इसी का नतीजा है कि देश की विपक्षी पार्टियों के नेताओं तक को इस बात की खबर न हो सकी है कि सरकार मीडिया के साथ क्या बर्ताव करने जा रही है। अब जबिक मीडिया के लोग सभी पोलिटिकल पार्टियों के नेताओं को सरकार की अलोकतांत्रिक मंशा के बारे में बता रहे हैं तो हर नेता का यही कहना होता है कि उन्हें तो इस बारे में खबर तक नहीं है।
दोस्तों, मीडिया में होने के नाते हम-आप पर जो दायित्व है, उसका निर्वाह 15 जनवरी के दिन हम-आप जरूर करेंगे, यह उम्मीद चौथे खंभे की आजादी में विश्वास रखने वाले हर शख्स को है।
न्यूज चैनलों के संपादकों ने काले कानून के प्रति सभी राजनीतिक पार्टियों को जागरूक करने और इस कानून को न लागू होने देने के मकसद से कई बड़े नेताओं से मुलाकात की। इस मुलाकात अभियान के तहत अब तक भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह, सीपीएम के जनरल सेक्रेटरी प्रकाश करात, सोनिया गांधी के राजनीतिक सलाहकार अहमद पटेल, सपा नेता अमर सिंह, केंद्रीय मंत्री राम विलास पासवान से मिल चुके हैं। आज शाम को भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी से मुलाकात तय है। इस बीच, देश भर के मीडियाकर्मियों ने 15 जनवरी को काला दिवस मनाने की तैयारी कर ली है। दिल्ली में जंतर-मंतर पर सैकड़ों की संख्या में मीडियाकर्मी दिन में 12 बजे उपस्थित होंगे और काला कानून बनाने के लिए केंद्रीय मंत्रियों में बांटे गए कैबिनेट नोट की प्रतियां जलाएंगे।
यही कहा जा सकता है कि यह मामला किसी पत्रकार संगठन या मीडिया के किसी खास हिस्से का नहीं है। यह हर मीडियाकर्मी और हर आजादी पसंद नागरिक का मामला है। आप संपादक हों, ट्रेनी हों या पत्रकारिता के छात्र हों, 15 जनवरी के दिन निजी तौर पर या सामूहिक तौर पर, जो भी विकल्प उपलब्ध हो, काला दिवस मनाना चाहिए। काला दिवस मनाने का यह मतलब कतई नहीं है कि हम काम पर न जाएं। पढ़ाई-लिखाई के साथ लड़ाई लड़ने के लिए नीचे लिखे तरीकों में से किसी एक को आजमा सकते हैं-
15 जनवरी को काली पट्टी माथे पर या बांह पर बांधकर ही घर से निकलें और पूरे दिन इसे बांधे रहें।
जरूरी समझें तो काले कानून के विरोध में सरकारी आयोजनों के कवरेज का सामूहिक रूप से बहिष्कार करें।
प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति को संबोधित एक ज्ञापन बनाएं और इसकी एक-एक कापी जिलाधिकारी को सौंपें।
विरोध दर्ज कराने के लोकतांत्रिक तरीकों धरना, उपवास, मौनव्रत, जुलूस, नारेबाजी को आजमा सकते हैं।
केंद्र सरकार के प्रतीकात्मक पुतले को जिला मुख्यालय पर नारेबाजी के साथ जला सकते हैं।
काले कानून की प्रतीकात्मक प्रतियों को जिला मुख्यालय पर जलाया जा सकता है।































